अहमदाबाद सत्याग्रह की कहानी

अहमदाबाद सत्याग्रह की कहानी
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बात है उस दौर की जब महात्मा गांधी नए नवेले दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट कर आये थे।दक्षिण अफ्रीका में रंग भेद के खिलाफ अंग्रेजी हुकूमत से लड़ने के बाद उन्होंने भारत की और रुख किया।भारत आने का उनका उद्देश्य अपने देश की जनता की आर्थिक,मानसिक और शारीरिक बेहतरी के लिए कार्य करना था जिसके लिए वे भर्शक रूप से प्रयास करने को भी तैयार थे।

भारत वापस लौटने के बाद उन्हें यह एहसास हुआ कि वे भारत की जनता और उनकी तकलीफों से काफी अनजान थे।उनकी इस समस्या को देखते हुए उनके गुरु और कांग्रेस नेता गोपाल कृष्ण गोखले ने उन्हें भारत भ्रमण करने का सुझाव दिया।गांधी ने अपने गुरु के सुझाव को तवज़्ज़ो देते हुए भारत भ्रमण प्रारंभ कर दिया,परंतु साल भर भ्रमण करने के बावजूद उनकी अंतरात्मा तृप्त नहीं थी और उन्होंने अपने इस भ्रमण में भारत के शहरों को शामिल पाया मगर गाँव की ज़िंदगी से वे काफी हद्द तक अनजान थे।गांधी जी ने अपनी इस कसक को चंपारण सत्याग्रह, खेड़ा सत्याग्रह और अहमदाबाद सत्याग्रह के बाद काफी हद तक पूरा कर लिया था और तो और इन सत्याग्रह से वे अपने आप को भारत में एक नेता के रूप में स्थापित करने में भी कामयाब हो गए थे।

आज हम बात करेंगे अहमदाबाद सत्याग्रह में सत्य, निडरता और अहिंसा वाली लड़ाई की।

साल था 1917 जब बारिश 30 इंच के जगह 70 इंच हो गयी था।राज्य में तरह-तरह की बीमारी फैली थी जिनमे से सबसे घातक था प्लेग,शहर से मजदूर अपने गाँव को जा रहे थे,कई उद्योग बंद हो रहे थे।इस वक्त अहमदाबाद के उद्योगपतियों ने घर जाते मजदूरों को रोकने के लिए 75% का प्लेग बोनस घोषित कर दिया और शायद यही कारण था कि जब शहर में सब कुछ ठप्प पड़ा था तब भी उद्योग बहुत अच्छी तरह उन्नति कर रहा था।1918 के पहले महीने में जब प्लेग खत्म हो गया तब उद्योगपतियों ने बोनस देने से इनकार कर दिया बदले में 20% की वृद्धि का प्रावधान दिया।गांधी जी ने जब इस घटना का संज्ञान लिया तो खुद तो मजदूरों के पक्ष में पाया।मिल के मजदूर 50% की वृद्धि की बात कर रहे थे जो गांधी जी के आग्रह पर 35% वृद्धि को तैयार थे जब कि मिल मालिक 20% से आगे बढ़ने को तैयार नही थे।इन सब के बीच मजदूरों ने हड़ताल कर दिया।अब मिल मालिक के प्रतिनिधि अम्बालाल साराभाई रख रहे थे जबकि उनकी बहन अनसूया साराभाई मजदूरों के हक्क के लिए अपने भाई के खिलाफ खड़ी थी।

अम्बालाल साराभाई अहमदाबाद के एक जैन उद्योगपतियों थे जिन्होंने गांधी जी को ₹13,000 की मदद दी थी ताकि वे सत्याग्रह आश्रम का खर्च उठा सके,₹13,000 सत्याग्रह आश्रम के दो साल के खर्चे की रकम थी।

गांधीजी और अनुसूया साराभाई की आग्रह पे मजदूरों ने उद्योगपतियों के खिलाफ 22 फरबरी 1918 से हड़ताल घोषित कर दी,वे हर शाम साबरमती के किनारे एक बबूल के पेड़ के नीचे बैठ गाने गाते,गांधीजी और अनुसूया की बातें सुनते।गांधी,अनुसूया संग उनके कार में घर जाते जबकि मजदूर पैदल अपने घर को निकलते।इस दौरान मजदूरों को जुआ खेलने से बचने को,दर्जी या मिस्त्री का काम करने को और आपस में एकजूट रहने की सलाह दी गयी।

हड़ताल को अब तीन हफ्ते हो चले थे,मजदूर हार मानने लगे थे।इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जिन शाम की सभा में लोग हज़ारों की तादाद में आ रहे थे वो घट कर मात्र सौ लोगो पे आ चुका था।कुछ मजदूर 20% की वृद्धि की बात मान कर वापस काम पे भी चले गए थे।जब गांधीजी ने इन सब का कारण जानना चाहा तो एक व्यक्ति के शब्द थे "अनुसूया और गांधीजी को क्या है?वे अपनी गाड़ी में आते-जाते है;उनका पेट भरा होता है,हमे भूक बर्दशात करनी होती है;सभा में जाने से पेट नही भरते।"

इन विचारों का संज्ञान लेके उन्होंने अनशन करने का फैसला किया(उन्होंने पहले व्रत रखें थे मगर अनशन पहले बार करने जा रहे थे)।15 मार्च 1918 को उन्होंने मजदूरों के सामने ये घोषणा करि की वे ना खाएंगे और ना गाड़ी की सवारी करेंगे।गांधी की इस प्रतिक्रिया से उद्योगपतियों पे काफी दवाव पड़ रहा था कारणवश आनंदशंकर ध्रुव को मध्यस्थता करने को बुलाया गया।समझौता कतरे हुए कारणवश आनंदशंकर ने मजदूरों को पहले दिन 35% फिर दूसरे दिन 20% वृद्धि देने को कहा जब तक वे पूरी कार्य का संज्ञान लेकर अपना निर्णय नही दे देते।

अगस्त 1918 में कारणवश आनंदशंकर ने मजदूरों के पक्ष में फैसला दिया और इसी के साथ बहन अपने भाई से जीत गयी।