दक्षिण अफ्रीका में गांधी के तिरस्कार की घटना

इस लेख में गांधी और उनकी उस रेल यात्रा का वर्णन है जिसने उन्हें एक वकील से सामाजिक कार्यकर्ता में तब्दील कर दिया।

दक्षिण अफ्रीका में गांधी के तिरस्कार की घटना
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मोहनदास करमचंद गांधी से महात्मा गांधी बनने के बीच अनेको काहानिया अपने पंख फैला कर एक पुल का स्वरूप लिए मौजूद है,इस काहानियो के पुल को ज्यों-ज्यों आप पर करेंगे त्यों-त्यों आप महात्मा के करीब बढ़ते जाएंगे।इस सफर में कभी आपको उनके साथ घटित आपत्ति जनक घटनाओं का ज्ञान होगा तो कहीं आप उनके भीतर के बदलाव को समझने में असमर्थ होंगे,मगर एक बात पक्की है कि इस सफर के अंत तक या तो आपको गांधी से प्यार हो जाएगा या फिर उनके बारे में और जानने के प्रयास में जुट जाएँगे।

आज गांधीजी की ज़िंदगी की ऐसी घटना का वर्णन करूँगा जिसके बाद ही उन्होंने सामाजिक कुरीतियों पे अपना ध्यान केंद्रित किया।यू तो वे एक बड़े घर के बेटे थे,उनकी आर्थिक स्तिथि का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उस ज़माने में भी उनके पिताजी के पास तीन मंज़िला मकान था।जिस घटना का मैं वर्णन करने जा रहा हूं,वो उनके साथ दक्षिण अफ्रीका में घटी थी जिसके बाद उन्होंने दक्षिण अफ़्रीका में रंग भेद के खिलाफ सत्याग्रह किया था।

बात है उस वक्त की जब मोहनदास गांधी,लंदन से अपनी वकालत की पढ़ाई पूरी कर के अपने देश वापस लौट चुके थे और बॉम्बे शहर में वकालत का अभ्यास कर रहे थे।इसी बीच उन्हें एक काठियावाडी वयापारी अब्दुल्ला सेठ का केस लड़ने का प्रस्ताव मिला, जिसके तहत उन्हें दक्षिण अफ्रीका जा कर अब्दुल्ला को केस जितवाना था।इस कार्य हेतु अब्दुला सेठ ने गांधी को एक मोटी रकम देने का प्रस्ताव रखा जिसे कबूलते हुए गांधी, दक्षिण अफ़्रीका के सफर के लिए रवाना हुएँ।

गांधी के दक्षिण अफ़्रीका पहुँचने के कुछ वक्त बाद उनके

मुवक्किल अब्दुल्ला सेठ को प्रीटोरिया से एक संदेश आया जिसके तहत उन्हें या उनके किसी प्रतिनिधि को प्रीटोरिया पहुँच अपनी उपस्थिति का संज्ञान न्यायालय को दिलवाना होगा।अब्दुल्ला सेठ ने इस कार्य भार को गांधी के कंधों पे सौंपते हुए उन्हें केस की सारी जानकारी साझा की और उनसे प्रीटोरिया के लिए प्रस्थान करने का आग्रह किया,उस वक्त गांधी और अब्दुल्ला सेठ डरबन में थे।

गांधी ने दक्षिण अफ़्रीका पहुँचने के करीब 17 दिन बाद प्रीटोरिया के लिए प्रस्थान किया।

अब्दुल्ला सेठ ने उनके लिए प्रथम श्रेणी की टिकट सुरक्षित कर लिया था,मगर गांधी ने 5 शिलिंग(दक्षिण अफ़्रीकी मुद्रा)बचाने के लिए बिस्तर सुरक्षित नही किया।रात के करीब 9 बज रहे थे जब रेलगाड़ी मारित्जबर्ग पहुँची।मारित्जबर्ग रेल अड्डे पर एक सहयात्री ने उन्हें गहरे नज़रो से घूरा, ऊपर से नीचे।गांधीजी की चमड़ी का रंग उसके चिंता का कारण बना था,वो इस बात को बर्दाश्त नही कर पाया कि एक काला आदमी(कुली) उसके साथ बैठा है।वो तुरंत ही कुछ रेलवे के कर्मचारियों को बुला लाया जिन्होंने गांधी को तुरंत तीसरी श्रेणी के डब्बे में जा कर बैठ जाने को कहा,जिसका विरोध गांधीजी ने अपने पास मौजूद टिकट दिखा कर किया।टिकट होने के बावजूद भी उन्हें तीसरी श्रेणी के डब्बे में जाने को कहा गया और ना मानने पर एक सिपाही ने उन्हें उनके सामान सहित ट्रैन से बाहर फेंक दिया।इस घटना के बाद गांधीजी बेहद गुस्से में थे गुस्सा ऐसा की रेल अड्डे पे बैठकर उन्होंने मारित्जबर्ग की ठंडी रात बिता दी।सुबह उन्होंने घटना का विवरण अब्दुल्ला को दिया,जिसके बाद मारित्जबर्ग के भारतीयों ने गांधी को सांत्वना दी।

अब अपनी यात्रा को पुनः आरम्भ करने हेतु गांधी चर्ल्सटॉवन से जोहानसबर्ग एक ट्रेन कोच में यात्रा कर रहे थे जब उन्हें उनकी सीट पे फिर से नही बैठने दिया गया और उन्हें एक सफेद व्यक्ति के पैरों के पास बैठने को कहा गया।वो बेहद क्रोधित हो गए और अपनी सीट की मांग करने लगें जिसके बाद उस व्यक्ति ने ज़ोर से उन्हें मारने शरू किया।गांधीजी इन सब घटनाओ से गुज़र कर टूट चुके थे और इसका विरोध करने का मन बना लिया था।इसके बाद यात्रा का अंतिम पड़ाव जो कि स्टैंडरतों से प्रीटोरिया का था।इस यात्रा के लिए फिर उनके पास प्रथम श्रेणी का टिकट था,रेल में कुछ देर सफर करने के बाद उनके पास एक सिपाही आया और उनसे तीसरी श्रेणी में जाने को कहा,इस बात को सुन गांधी पुनः परेशान हो गए और वो कुछ बोलते की एक सफेद व्यक्ति ने नरम दिल होकर सिपाही से आग्रह किया के गांधी की प्रथम श्रेणी में रहने दिया जाए।उस दिन प्रथम श्रेणी में गांधी और उस व्यक्ति के सिवा कोई और नही था।