गाँधीजी के "Double shame(दोगुनी शर्म)" की कहानी

ये घटना गांधीजी द्वारा लिखित उनकी जीवनी से ली गयी है,इसमे उस घटना का वर्णन है जिसने गाँधीजी को खुद पे दोगुना शर्म करने पे मजबूर कर दिया।

गाँधीजी के "Double shame(दोगुनी शर्म)" की कहानी
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बापू यानी के मोहनदास करमचंद गांधी भारत और विश्व के लिए एक बेहद चर्चित नाम है।यह नाम अफ्रीका और एहम तौर पर भारत के आज़ादी के संदर्भ में चर्चित हुआ।अहिंसा,सत्याग्रह,सत्यनिष्ठा और आज़ादी की लड़ाई ने एक काठियावाड़ी परिवार में जन्मे बच्चे को महात्मा बना दिया।किन्तु महात्मा वो ऐसे ही नहीं बने थे,महात्मा बनने के पीछे उनकी ग़लतियों से सीखने की आदत,सच बोलना,बड़ो का सम्मान करना,दृढ़ निश्चय करना और अपने रास्ते खुद बनाते हुए उनपर चलने का साहस रखना जैसे कई आदतें शामिल है।मोहनदास गांधी ने अपने जीवन मे एक वकील,नर्स,संपादक और समाज सेवी के रूप में कार्य किया है।भारत के इतिहास में उनसे बड़ा कोई नेता आज तक पैदा नही हुआ मगर उन्होंने कभी अपने आप को राजनेता नही कहा वो सदैव अपने आप को एक धार्मिक गुरु अथवा समाज सेवी के रूप में जनता के सामने पेश किया करते थे।आपको जान कर आश्चर्य होगा कि उनका नाम आज भी भारत के इतिहास में जन्मे शिर्ष पत्रकारों की सूची में शामिल है।उनकी लिखी "हिन्द स्वराज" जो उस समय अंग्रेजी हुकूमत द्वारा प्रतिबंधित कर दी गयी थी,आज भी पत्रिकारिता के छात्रों के लिए अमृत है।इस किताब में गांधी जनता के मन में उठने वाले प्रशन के उत्तर खुद ही दे रहे है,वास्तव में यह किताब उनके और उनके मित्र प्रणजीवन मेहता के बीच की बात चीत को दर्शाती है।

गाँधीजी के गुणों की बात तो होती रहेगी क्योंकि वो अंगिनत हैं,आज हम बात करेंगे गाँधीजी की उस गलती के बारे में जिसका जिक्र उन्होंने खुद अपने जीवनी "सत्य के प्रयोग" में लिखी है।

Double shame(दोगुनी शर्म)

बात है उस समय की जब गाँधीजी की उम्र 16 थी और उनकी शादी कस्तूरबा से हो चुकी थी।गाँधीजी की शादी एक बालविवाह की घटना थी,उनदिनों यह घटना आम थी,उस वक्त के लोगों के हिसाब से शादी की यही उम्र सही थी,बच्चों के मानसिक या शारीरिक विकास का इंतज़ार करना जैसी बातें बकवास थीं।परिणाम कस्तूरबा गर्भवती थी जब उनकी उम्र केवल 16 वर्ष के करीब थी।करमचंद गांधी जो उस वक्त तक लगभग 63 वर्ष के हो चले थे अपनी बीमारी से काफी परेशान रहा करते थे।वे फिस्टुला नामक बीमारी के मरीज़ थे।इस बीमारी में मांस बढ़ने की समस्या होती है।स्तिथि ऐसी थी कि वे शय्याग्रस्त रहने लगे थे।तब 16 वर्षिय गाँधीजी ही अपने पिता की सेवा किया करते थे,चाहे उनके शरीर को मालिश करना हो या उनके लिए दवा बनाना सारा काम वो बेहद खुसी के साथ किआ करते थे।वो रोज़ रात को अपने पिता के पैर दबाया करते थे और तभी रुकते थे जब उनके पिताजी उनसे जाकर सोने को कहते थे।गाँधीजी स्कूल से आने के बाद अपना पूरा समय अपने पिताजी की सेवा मे लगाया करते थे,वे श्रवण कुमार के जैसे अपने पिताजी की सेवा करना चाहते थे।एक दिन की बात है जब गाँधीजी रोज़ की तरह अपने पिताजी के पैर दबा रहे थे मगर उनके मन में जिस्मानी इच्छाएं आ रहीं थी वे चाह रहे थे कि कब उनके पिताजी उन्हें रोक दी और अपने कमरे में जाने को कहें।वो थे तो अपने पिता के पास मगर उनके मन और ध्यान कहीं और था,इसी बीच गाँधीजी के चाचा अपने भाई से मिलने आए और उनके पास आकर बैठ गए।दोनों भाइयों में काफी मेल था,परिणाम वे दोनों बात-चीत मे लग गए,दोनों भी बात -चीत मे कुछ इस तरह व्यस्त हो गए कि करमचंद गांधी सोने को राज़ी नही थे।यह सब देखकर गाँधीजी ने अपने चाचा से आग्रह किया के वे आज अपने बड़े भाई की थोड़ी सेवा कर दे और उन्होंने अपने पिता से अपने कमरे में जाने की अनुमति मांगी।वे अपने कमरे में गए और अपनी सोती पत्नी को जगाया ताकि वे अपनी इच्छा पूरी कर सकें,इन सब को कुछ 6-7 मिनट ही हुए थे कि गाँधीजी के कमरे पे दस्तक हुई,पता चला के पिताजी का देहांत हो गया है।इतना सुन्ना था कि गांधी शर्म के मारे पानी-पानी हो गए और पश्चातव की अग्नि मे जलने लगे,उन्हें बहुत दुख था के अपनी पिता की अंतिम घड़ी में उन्होंने उनका साथ छोड़ दिया।इसके कुछ समय बाद कस्तूरबा की कोख से जो बच्चा पैदा हुआ वो भी केवल 4 दिनों में धरती छोड़ चला गया।

यही दो कारण है महात्मा के शर्म की,इन घटनाओं का वर्णन उन्होंने अपने आप को दोषी मानते हुए अपनी जीवनी मे किआ है।

ये दोनों गलतियां है या कहें पाप हैं मगर क्या आप ये नहीं मानेंगे की इन गलतियों को उन्होंने खुद कुबूला और तो और इनकी सज़ा उन्हें पहले ही मिल चुकी है।उन्होंने अपने पिता और बच्चे को खो दिया क्या ये उस गलती के लिए पर्याप्त सज़ा नही है?