Farmer's Protest in Indian History: वर्तमान और इतिहास के कुछ प्रमुख कृषक आंदोलन

Farmer's Protest in Indian History: वर्तमान और इतिहास के कुछ प्रमुख कृषक आंदोलन
Farmer's Protest in Indian History: वर्तमान और इतिहास के कुछ प्रमुख कृषक आंदोलन
Farmer's Protest in Indian History: वर्तमान और इतिहास के कुछ प्रमुख कृषक आंदोलन

भारतीय किसान एक बार फिर सड़क पर अपना विरोध प्रकट कर रहें हैं। मसला संसद द्वारा पारित तीन कृषि अधिनियमों का है जिसने पूरे देश में संवैधानिक वैधता पर बहस छेड़ दी है। तीन बिलों में से प्रत्येक कृषि विपणन के एक पहलू से संबंधित है। कृषि विपणन (Agricultural marketing) के अन्तर्गत वे सभी सेवाएँ आ जातीं हैं जो किसान को उपज को खेत से लेकर उपभोक्ता तक पहुँचाने में करनी पड़तीं हैं। सामूहिक रूप से, वे उन बाधाओं को कम करने के लिए ड्राफ़्ट किए गए हैं; जिसका किसानों को विभिन्न कृषि-खाद्य आपूर्ति श्रृंखला अभिनेताओं से जुड़ने में सामना करना पड़ता था। उनका उद्देश्य पारंपरिक एपीएमसी-आधारित बिचौलियों पर निर्भरता कम करके और एक "राष्ट्र-एक बाजार" बनाना है। यह विधेयक किसानों को बगैर किसी शोषण के भय के प्रसंस्करणकर्त्ताओं, थोक विक्रेताओं, बड़े खुदरा कारोबारियों, निर्यातकों आदि के साथ जुड़ने में सक्षम बनाएगा।इसके माध्यम से किसान प्रत्यक्ष रूप से विपणन से जुड़ सकेंगे, जिससे मध्यस्थों की भूमिका समाप्त होगी और उन्हें अपनी फसल का बेहतर मूल्य प्राप्त हो सकेगा। इस विधेयक से कृषि उपज को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुँचाने हेतु आपूर्ति श्रृंखला के निर्माण तथा कृषि अवसंरचना के विकास हेतु निजी क्षेत्र के निवेश को बढ़ावा मिलेगा।

संसद द्वारा पारित तीन कृषि अधिनियमों ने पूरे देश में संवैधानिक वैधता पर कम्पन छेड़ दी है। प्रधान मंत्री ने दावा किया है कि विपक्ष कृषि बिलों पर देश को गुमराह कर रहा है। मोदी कहते कि वे न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) शासन को कभी खत्म नहीं करेंगे। तथ्य यह है कि तीन अध्यादेश, जो अब संसद द्वारा अनुमोदित किए गए हैं, बिना जांच के, एमएसपी दूर करने या सरकार द्वारा खाद्यान्नों की खरीद का कोई उल्लेख नहीं करते हैं। साथ ही किसानों को अभी भी 2022 तक अपनी आय दोगुनी होने का इंतजार है, जैसा कि 2014 में भाजपा और नरेंद्र मोदी ने वादा किया था । सरकार के प्रति अविश्वास ऐसा है कि किसान अंकित मूल्य पर प्रधानमंत्री के आश्वासन को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।

कम से कम कागज़ पर सरकार द्वारा शुरू किए गए तीन कानून बहुत अच्छे लगते हैं। किसानों का उत्पादन व्यापार और वाणिज्य विधेयक, 2020 - किसानों को कृषि उपज बाजार समिति (एपीएमसी) को दरकिनार करने और उपज को सीधे किसी बड़ी कंपनी, गोदामों, कोल्ड स्टोरेज चेनों, या यहां तक ​​कि दुकान स्थापित करने की एवं उपभोक्ताओं को सीधे बेचने तक की अनुमति देता हैं।यह विधेयक राज्य-स्तरीय एपीएमसी अधिनियमों को दरकिनार करने का प्रयास करता है।

मूल्य आश्वासन और फार्म सेवा विधेयक, 2020 पर किसान (सशक्तीकरण और संरक्षण) समझौता, अनुबंधित खेती के लिए अनुमति देता है, एक किसान को एक विशिष्ट मूल्य के लिए विशिष्ट उत्पादों की खेती करने के लिए एक खरीदार के साथ अनुबंध करने के लिए। यह सुनिश्चित करता है कि किसानों को खेती शुरू होने से पहले ही कीमत मिल जाएगी।

आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक, 2020 खरीदारों को खरीददार और कमोडिटीज स्टॉक करने की अनुमति देता है।

भारत में किसानों का इतिहास

भारत में किसानों का सरकार एवं शासकों के खिलाफ आंदोलन / विरोध का कारवां यह कोई पहली दफा नहीं है। हमारा इतिहास किसानों द्वारा खुद के हक के लिए खड़े होने के ऐसे कई आंदोलनकारी घटनाओं से अभिभूत है।

आजादी से पहले किसानों ने अपनी मांगों के समर्थन में जो आंदोलन किए उसने अंग्रेजी हुक्मरानों की नीव तक हिला कर रख दी थीं। भारत के स्वाधीनता आंदोलन में जिन लोगों ने शीर्ष स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, उनमें आदिवासियों, जनजातियों और किसानों का योगदान अहम रहा है।

नील आन्दोलन (1859-1860 ई.)

भारत में पहला कृषक आंदोलन सन् 1859 में हुआ था ।यह आंदोलन भारतीयों किसानों द्वारा ब्रिटिश नील उत्पादकों के खिलाफ बंगाल में सन् 1859-1860 में किया गया।

पाबना विद्रोह (1873-1876 ई.)

1873 ई. में पबना के किसानों ने जमींदारों के शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाने की ठानी और किसानों का एक संघ बनाया। किसानों की सभाएँ आयोजित किए गए इस आन्दोलन के परिणामस्वरूप 1885 का बंगाल काश्तकारी कानून (Bengal Tenancy Act) पारित हुआ जिसमें किसानों को कुछ राहत पहुँचाने की व्यवस्था की गई।

मोपला विद्रोह (1921 ई.)

केरल के मोपला मुसलमानों द्वारा सन् 1921 में स्थानीय जमींदारी द्वारा ब्रिटेनियों के विरुद्ध किया गया था।

कूका विद्रोह( 1871–72)

कूका विद्रोह सन 1871–72 में पंजाब के कूका लोगों (नामधारी सिखों) द्वारा किया गया एक सशस्त्र विद्रोह था जो मूलतः अंग्रेजों द्वारा गायों की हत्या को बढ़ावा देने के विरोध में किया गया था।

चम्पारण सत्याग्रह (1971)

चम्पारन सत्याग्रह गांधीजी के नेतृत्व में बिहार के चम्पारण जिले में सन् 1917-18 में हुआ। गांधीजी के नेतृत्व में भारत में किया गया यह पहला सत्याग्रह था।

खेड़ा सत्याग्रह(1918)

खेड़ा सत्याग्रह गुजरात के खेड़ा जिले में किसानों का अंग्रेज सरकार की कर-वसूली के विरुद्ध एक सत्याग्रह (आन्दोलन) इसे प्रथम असहयोग आंदोलन भी कहा जाता है।

बारडोली सत्याग्रह(1928)

बारडोली सत्याग्रह, बारदोली सत्याग्रह भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान जून 1928 में गुजरात में हुआ यह एक प्रमुख किसान आंदोलन था जिसका नेतृत्व वल्लभ भाई पटेल ने किया था। 

रामोसी विद्रोह(1922)

रामोसी विद्रोह पूना में 1922 में हुआ था। यह विद्रोह पूना के रमोसी जनजाति द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध किया गया था।

अखिल भारतीय किसान सभा

स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में बिहार में किसान सभा आंदोलन शुरू हुआ।भारत में संगठित किसान आंदोलन खड़ा करने का श्रेय स्वामी सहजानंद सरस्वती को जाता है। दण्डी संन्यासी होने के बावजूद सहजानंद ने रोटी को ही भगवान कहा और किसानों को भगवान से बढ़कर बताया. उन्होंने किसानों को लेकर नारा भी दिया था:

{'जो अन्न-वस्त्र उपजाएगा, अब सो कानून बनायेगा

ये भारतवर्ष उसी का है, अब शासन वहीं चलायेगा'}