हैदराबाद के भारत में विलय की कहानी

इस लेख में हैदराबाद के भारत से मिलने की कहानी है,भारत की आज़ादी और विभाजन के बाद हैदराबाद स्वतंत्र रहना चाहता था परिस्थितियों के कारण उसे भारत में जुड़ना पड़ा ।उन परिस्थितियों को जानने के लिए लेख को तवज़्ज़ो दे।

हैदराबाद के भारत में विलय की कहानी
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आज मैं अपने एक मित्र के साथ हैदराबादी बिरयानी का लुफ़्त ले रहा था के बगल वाली मेज़ पे हैदराबादी बिरयानी खा रहे एक हमउम्र युवक ने मेरे दिमाग की नसें छेड़ दी जब उसने बिरयानी के साथ रायते की जगह मटन करी खाने का चयन किया।मैंने काफी नरमी से उनको समझाया कि मित्र आप बिरयानी के साथ रायते का लुफ़्त ही ले क्योंकि यह परंपरागत और उत्तम है।नवयुवक मेरी बातों से चिढ़ गया और मेरे ज्ञान की परीक्षा लेने हेतु उसने मुझसे हैदराबाद का भारत में विलय का इतिहास पूछ डाला,अब यूं तो मैं सहम जाता मगर इस प्रश का उत्तर मुझे भली-भाती ज्ञात था।फिर क्या, मैन शुरू किया ज्ञान देना और युवक ने शुरू किया मुझसे प्रेरित होना।

गहरे रंग से रियासतें ऐंव हलके रंग से अग्रेजी हुकूमत वाले भारत का नक्शा।

बात थी उस समय की जब भारत की आज़ादी की घोषणा हो चुकी थी और लुइस फ्रांसिस एल्बर्ट विक्टर निकोलस जॉर्ज माउंटबेटन भारत की आज़ादी की प्रक्रिया को पूरा करने हेतु भारत के अंतिम वाइसरॉय बनकर भारत आ चुके थे।आम जनमानस से लेकर राजा-महाराजाओं में जहां देश की आज़ादी के लिए ख़ुसी थी वही कहीं न कहीं विभाजन का डर भी बना हुआ था।भारत उस वक्त अगर पाकिस्तान को मिले ज़मीनी हिस्से को छोड़ दिया जाए तो कुल 562 रियासतों में बटा हुआ था।इनमे से कुछ रियासतें कश्मीर और हैदराबद जैसी आबादी और क्षेत्र वर्ग से बड़ी रियासतें हो कुछ रियासतें केवल 12 गांव की बनी हुई थीं।हैदराबाद जिसकी उस समय आबादी करीब 1.6 करोड़ की थी और क्षेत्र फल करीब 80 हज़ार मील उसके शाशक थे निज़ाम मीर उस्मान अली खान।1911 में उस्मान अली ने निज़ाम की गद्दी प्राप्त की,राज्य का 10% ज़मीन उनके अपने नाम पे था जिससे मिलने वाला किराया लगभग ₹2.5 करोड़ सालाना हुआ करता था साथ ही साथ उनके राज्य के खजाने से हर वर्ष ₹50 लाख और प्राप्त होते थे जिसकी वजह से उनका नाम उस समय के दुनिया के सबसे अमीर व्यक्तियों की सूची में शामिल था।उस्मान अली इतने धनवान होने के बावजूद भी काफी दैनिये स्तिथि में अपना गुज़र बसर किआ करते थे,वो बगैर आयरन किया हुआ पजामा और शर्ट पहना करते थे,उनकी गाड़ी 1918 की थी और वे कभी भी किसी के लिए किसी तरह की स्वागत समारोह वगेरा नही किआ करते थे।

राज्य प्रतिनिधि यानी के राजाओं को ये कार्य सौंपा गया था कि या तो वे भारत अथवा पाकिस्तान के साथ जुड़े या तो स्वयं की आज़ाद घोषित करें।सारे राजा अपनी प्रजा की सहूलियत के हिसाब से ये चुनाव कर रहे थे।जिस राज्यों में मुस्लिम जनसंख्या ज्यादा थी वे पाकिस्तान के साथ जुड़ रहे थे वही जिनमे हिन्दू,सिख ज्यादा थी वे भारत की और रुख कर रहे थे।इनसब के बीच हैदराबद जिसकी 85% आबादी हिन्दू थी,एक मुसलमान शाशक द्वारा शाषित राज्य था।राज्य में अन्न ,सीमेंट ,कोयला,कपास की कोई कमी नही थी।इस तर्ज पे मीर उस्मान अली ने अपने राज्य को आज़ाद रख न भारत से नाही पाकिस्तान से हाथ मिलाने को स्वीकार किया।

हैदराबाद का आज़ाद रहना भारत के लिए काफी चिंता की बात थी क्योंकि हैदराबाद की सीमा बॉम्बे,मद्रास और सेंट्रल प्रोविंस से लगती थी।हैदराबद का भारत से अलग होना उत्तर भारत और दक्षिण भारत में काफी दूरी पैदा कर सकता है।इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए भारत के प्रथम गृह मंत्री सरदार पटेल ने सीधे शब्दों में ' भारत के पेट में कैंसर है ' इस तरह से हैदराबाद के आज़ाद होने के निर्णय का खंडन किया।

उस्मान अली ने अपनी निर्णय को अमल में लाने के लिए और कांग्रेस के 1938 में बनाए गए "हैदराबाद राज्य कांग्रेस" के विरोध में "इतिहाद-उल-मुस्लिमीन" का गठन किया साथ ही साथ ब्रिटिश वकील वाल्टर मोंकटों को एक मोटी रकम दिया ताकि वे उस्मान अली और अंग्रेज़ी हुकूमत के बीच की तार बने।

भारत के हित में जब एक दफा माउंटबेटन ने उस्मान अली से भारत में शामिल होने की गुज़ारिश की तो वाल्टर मोंकटों ने भारत को धमकी देते हुए लिखा कि अगर भारत इसी तरह उस्मान अली पे दवाव बनाने की कोशिश करेगा तो उस्मान अली पाकिस्तान के साथ जुड़ने को अहमियत देंगे।समय के साथ राज्य में इतिहाद-उल-मुस्लिमीन की गतिविधियां तेज़ हो गयी उन्होंने कासिम रिज़वी की प्रधनता में रजाकार नामक एक दल का गठन किया जो कि राज्य में बंदूक और तलवार लेकर घुमा करते थे।

अंग्रेजी हुकूमत से मिलते खत निज़ाम के सपनो को सच की और धकेलते हुए दिख रहे थे,वही पाकिस्तान के मुख्या जिन्नाह ने भी इस मुद्दे तो तवज़्ज़ो देना शुरू कर दिया था।

जिन्नाह ने माउंटबेटन को धमकाते हुए सीधे शब्दों में लिखा कि अगर कांग्रेस हैदराबाद पे अगर किसी भी तरह से दवाब डालने की कोशिश करेगी तो सारा मुस्लिम समुदाय पूरे भारत में हैदराबाद के बचाव में इसका विरोध करेगा।इन सब के बीच माउंटबेटन ने अपने पद भार से स्तीफा दे दिया था और वापस ब्रिटैन लौट चुके थे।भारत छोड़ने से पहले उन्होंने फिर से एक बार निज़ाम को भारत के साथ जुड़ने के लिए मनाने की नाकाम कोशिश करी।अब माउंटबेटन के जाने के बाद इस मुद्दे को सरदार पटेल ने सीधे अपने हाथों में लिया,तारीख थी 13 सितंबर 1948 जब पटेल के आदेश पर भारतीय सेना की एक टुकड़ी हैदराबाद में दाखिल हुई।

17 सितंबर 1948 की रात को निज़ाम ने रेडियो पे अपने राज्यो के लोगो को संबोधित करते हुए एक भाषण दिया जो माना जाता है कि सरदार पटेल के करीबी के.म.मुंशी ने निज़ाम के लिए लिखा था।इस संबोधन में उन्होंने रजाकार पे प्रतिबद्ध की घोषणा की साथ ही साथ जनता से आग्रह किया के वे भारत की जनता बनकर अपना जीवन शांति और खुशी से गुज़ारे।भारत की करवाई में 2,000 रजाकार मारे गए वहीं भारतीय सेना के भी 42 जवान सहीद हो गए।

एक बात ये भी थी कि भारत की करवाई से दो रोज़ पहले ही पाकिस्तान के संस्थापक जिन्नाह का देहांत हो गया था।

ये थी कहानी हैदराबाद के भारत में विलय होने की।