Junoon E03: माउंटेन मैन “दशरथ मांझी" की कहानी

अगर हौसला बुलंद हो तो दुनिया का कोई भी काम असंभव नहीं है । यह बात दशरथ मांझी ने बखूबी साबित करके दिखाया है।  पर्वत पुरुष दशरथ मांझी ने छेनी हथौड़ी एवं मजबूत इरादे से पहाड़ का सीना चीर कर दिखाया है । दशरथ मांझी, एक ऐसा नाम जो इंसानी जज्‍़बे और जुनून की मिसाल है. वो दीवानगी, जो प्रेम की खातिर ज़िद में बदली और तब तक चैन से नहीं बैठी, जब तक कि पहाड़ का सीना चीर दिया।


 दशरथ मांझी का जन्म 14 जनवरी 1929 को बिहार में गया जिला के एक छोटे से गांव गहलौर में हुई थी । उनके परिवार वाले बहुत ही गरीब थे इनका जन्म हरिजन समाज के मुसहर जाति में हुई थी । शुरुआती जीवन में उन्हें अपना छोटे से छोटा अधिकार मांगने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता था ।  गांव में रहने वाले लोग को वहां से बाजार जाने के लिए पहाड़ को पार करना पड़ता था या पहाड़ को चक्कर लगाना पड़ता था ।


 उस समय देश के अधिकतर गांव विकास कर रही थी परंतु गहलौर  में उन दिनों नही बिजलीथी  और नहीं पानी , उन्हें हर छोटी  बड़ी जरूरत के लिए गांव से बाहर जाना पड़ता था वो भी पहाड़ी को पार कर के । दशरथ मांझी ने बहुत कम उम्र में ही अपना गांव छोड़कर धनबाद चले गए थे ।  दशरथ मांझी धनबाद जाने के बाद लगभग 10 वर्षों तक वहां कोयला खदान में काम किया था । 10 वर्षों तक कोयला खदान में काम करने के पश्चात दशरथ माझी अपने गांव वापस आ गए थे और गेहलौर में अपनी पत्नी के साथ रहा करते थे ।  उनकी आर्थिक स्थिति सही नहीं थी जिसके कारण वह जमींदारों के यहां मजदूरी किया करते थे ।  एक दिन दशरथ मांझी खेत में काम कर रहे थे और उनकी पत्नी फागुनी देवी उन्हें दोपहर का खाना पहुंचाने खेत में आ रही थी ।
 फागुनी देवी पहाड़ को पार करके खाना पहुँचाने आ रही थी तभी उसकी पैर पत्थर से पिछल गई और फागुनी पहाड़ के दरार में जा गिरी  । और सही समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण दशरथ मांझी की पत्नी का  देहांत हो गई  । चुकी गांव  में  कोई अस्पताल नहीं था और  गांव से शहर जाने के लिए उस पहाड़ को पार करना पड़ता था , जिसे पहाड़ को पार करने में काफी समय लग जाती थी यही कारण था जब दशरथ मांझी की पत्नी फागुनी देवी को सही समय पर अस्पताल नहीं पहुंचा पाए जिसके कारण उनकी देहांत हो गई।


 पत्नी की मृत्यु के बाद दशरथ मांझी को अंदर से तोड़ दिया था । क्योंकि वह अपनी पत्नी को बहुत प्यार करते थे उनके बाद उन्होंने उस पहाड़ को काटकर रास्ता बनाने का निर्णय लिया ।  दशरथ मांझी ने अपने पालतू बकरी को बेचकर छेनी- हथोड़ा लिया और पहाड़ को तोड़ना शुरू कर दिया शुरू में गांव वालों ने दशरथ मांझी को पागल कहने लगा तो कई लोग उसे सनकी भी कहने लगा था ,  परंतु दशरथ मांझी ने किसी की बात नहीं सुनी और निरंतर पहाड़ को तोड़ता रहा और अपने बुलंद हौसले और मजबूत इरादे पर डाटा रहा है ।


 मांझी के प्रयत्न का सकारात्मक नतीजा निकला। केवल एक हथौड़ा और छेनी लेकर उन्होंने अकेले ही 360 फुट लंबी 30 फुट चौड़ी और 25 फुट ऊँचे पहाड़ को काट के एक सड़क बना डाली। इस सड़क ने गया के अत्रि और वज़ीरगंज सेक्टर्स की दूरी को 55 किमी से 15 किमी कर दी ताकि गांव के लोगो को आने जाने में तकलीफ ना हों। आख़िरकार 1982 में 22 वर्षो की मेहनत के बाद मांझी ने अपने कार्य को पूरा किया। उनकी इस उपलब्धि के लिए बिहार सरकार ने सामाजिक सेवा के क्षेत्र में 2006 में पद्म श्री हेतु उनके नाम का प्रस्ताव भी रखा।

फिल्म प्रभाग ने इन पर एक वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री) फिल्म ” द मैन हु मूव्ड द माउंटेन” का भी 2012 में उत्पादन किया कुमुद रंजन इस वृत्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री) के निर्देशक हैं। जुलाई 2012 में निर्देशक केतन मेहता ने दशरथ मांझी के जीवन पर आधारित फिल्म मांझी: द माउंटेन मैन बनाने की घोषणा की। अपनी मृत्युशय्या पर, मांझ ने अपने जीवन पर एक फिल्म बनाने के लिए “विशेष अधिकार” दे दिया। 21 अगस्त 2015 को फिल्म को रिलीज़ की गयी। नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने मांझी की और राधिका आप्टे ने फाल्गुनी देवी की भूमिका निभाई है। मांझी के कामों को एक कन्नड़ फिल्म “ओलवे मंदार” ( Olave Mandara) में जयतीर्थ (Jayatheertha) द्वारा दिखाया गया है। मार्च 2014 में प्रसारित टीवी शो सत्यमेव जयते का सीजन 2 जिसकी मेजबानी आमिर खान ने की, उनका पहला एपिसोड दशरथ मांझी को समर्पित किया गया।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली में पित्ताशय (गॉल ब्लैडर) के कैंसर से पीड़ित मांझी का 73 साल की उम्र में, 17 अगस्त 2007 को निधन हो गया। बिहार की राज्य सरकार के द्वारा उनका अंतिम संस्कार किया गया।

मांझी ‘माउंटेन मैन’ / Manjhi The Mountain Man के रूप में विख्यात हैं। उनकी इस उपलब्धि के लिए बिहार सरकार ने सामाजिक सेवा के क्षेत्र में 2006 में पद्म श्री हेतु उनके नाम का प्रस्ताव रखा।