Junoon: कबाड़ से किया कमाल हर साल कमा लेती हो 1000000 रुपए

कबाड़ से किया कमाल हर साल कमा लेती हो 1000000 रुपए
इस दुनिया में कुछ भी कबाड़ या बेकार नहीं है। जो आपके लिए कबाड़ है, हो सकता है किसी और के लिए रोजगार का साधन है। सबसे दिलचस्प बात यह है। कि हमारे देश में बहुत से ऐसे लोग हैं जो इस बात को सच करके दिखा रहे हैं। आज हम आपको वाराणसी की सीखा शाह  से मिलवा रहे हैं। जो पिछले 5 सालों से कबाड़ को नया रूप देकर उपयोगी चीजें बना रही है। साथ ही अपने 1 साल से लगभग 15 लोगों को रोजगार भी दे रही है। 

32 वर्षीय सिखा के ब्रांड का नाम है।

Scrap शाला

इसके जरिए व तरह-तरह के उत्पाद बनाकर ग्राहकों को उपलब्ध कराती है पेन स्टैंड, बांस का टूथब्रश , नेमप्लेट, होमडेकोर के अलावा वह ऑर्डर मिलने पर अपसायकल किया हुआ फर्नीचर भी बनाती है। जैसे - पुराने  टायरों से स्टूल   कुर्सी सा मेज बनाना आदि। दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने वाली शिखा ने कभी बिजनेस करने के बारे में नहीं सोचा था । लेकिन, कहते हैं ना कि जिंदगी आपके मुताबिक नहीं चलती कई बार आपके अनुभव ,आपके भविष्य की दिशा तय कर देते हैं। 

शिखा के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ है द बेटर इंडिया से बात करते हुए उन्होंने बताया कि ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने वॉटर साइंस मैनेजमेंट में मास्टर किया इसके बाद रिलायंस फाउंडेशन जैसे संगठनों के साथ काम किया उन्होंने कहा इन सब के दौरान मैंने कचरे की समस्या सामान्य रूप से देखी है मुझे अपने काम के दौरान बहुत कुछ सीखने को मिला और वही से मेरे मन में ख्याल भी आया कि वेस्ट मैनेजमेंट के लिए मुझे कुछ करना चाहिए इसी कड़ी में शिखा को आईआईटी मद्रास की इनक्यूबेशन सेल के साथ काम करने का भी मौका मिला।

शिखा साल 2016 में अपने घर वाराणसी लौटीं। यहां भी कचरे की समस्या तो थी लेकिन एक और बात उन्होंने यहां समझी कि लोग बहुत से कचरे को अपने घर के कोने में सहेज कर रखते हैं । क्योंकि पुरानी चीजों को फिर से उपयोग करने की भारतीय सोच उन्हें कोई भी चीज आसानी से फेंकने नहीं देती है । लेकिन यह सोच कारगर तभी हो सकतीं है । जब सही मायने में इस कचरे  को काम में लाया जाए। शिखा ने इसकी शुरुआत अपने घर से ही कि उन्होंने अपने घर में रखी कुछ कांच की बोतलों को पेंट करके उन्हें नया रूप देने की कोशिश की। 

वह बताती है, " इस कला मैं महरोनी  होने से मुझे भी कई महीने लगे। लेकिन इतना जरूर था कि मुझे चीजों को देखकर समझ में आ जाता था कि इस से क्या बनाया जा सकता है। वाराणसी कलाकार का शहर है। यहां हर गली मोहल्ले में आपको एक से बढ़कर एक कारीगर मिलेंगे। लेकिन इन कारीगरों को ढूंढना जितना आसान था, उन्हें अपने साथ रख पाना उतना ही मुश्किल था। 

लगभग 1500000 रुपए के निवेश से शिखा ने अपने  स्क्रैप बिजनेस की शुरुआत की। उन्होंने कबाड़ी वालों से पुरानी चीजें खरीदी । कुछ लोगों ने उन्हें अपने घर में पड़ी बेकार पुरानी चीज भी दी। शिखा कहती है की शुरुआत में यह सब करना बहुत मुश्किल था क्योंकि आप बहुत ही अव्यवस्थित क्षेत्र है। आप जो चीजें लेकर आ रहे हैं आपको भी नहीं पता कि इनसे आप क्या बनाने वाले हैं।  फिर जिन कारीगरों को
उन्होंने शुरू में रखा उन्हें भरोसा दिलाना बहुत मुश्किल था कि उनके बनाए इन नए तरह के उत्पादों को कोई खरीदेगा। 
उन्होंने कहा पहले कई कारीगर आए और चले गए।  लेकिन हार मानना कोई विकल्प नहीं था। इसलिए मैंने कोशिश जारी रखी और नई-नई चीजें शुरू की। जैसे कि काफी महिलाएं मुझसे कहने लगी कि उन्हें पुरानी बेकार चीजों को नई चीजों में अपसायकल करना सीखना है। इसलिए मैंने अलग-अलग तरह के वर्क शॉप शुरू किए। जैसे कुछ वर्कशॉप बच्चों के साथ तो कुछ खास तौर पर महिलाओं के साथ ।हमारा वर्कशॉप का आईडिया काम कर गया और इन वर्कशॉप से ही हमें ग्राहक भी मिलने लगे। 

कोरोना महामारी के पहले तक शिखा हर महीने लगभग चार-पांच वर्कशॉप करती थी ।उन्होंने शहर के स्कूल कॉलेज के अलावा कई सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर भी वर्कशॉप किया है।इन  वर्कशॉप मैं शिखा लोगों को सिखाती है कि वह अपने घर के कांच, प्लास्टिक या कपड़ों को अपसायकल करके उपयोगी चिजें  कैसे बना सकते हैं। हालांकि फिलहाल वह ऑनलाइन वर्कशॉप कर रही है और कुछ समय पहले उन्होंने घर पर ही होली के जैविक रंग बनाने की वर्कशॉप भी की थी।