Kahaniyan By Aditi Sinha: कहानी Don Shahabuddin की

दो बार विधायक, चार बार एमएलए(MLA) रहा, एक बाहुबली माफिया नेता, मोस्ट वांटेड DON और बिहार में आतंक का दूसरा नाम..
आज की कहानियाँ में कहानी मोहम्मद शहाबुद्दीन की, जिसकी बीते शनिवार 1 मई को कोरोना से मौत हो गई। 

मोहम्मद शहाबुद्दीन का जन्म 10 मई 1967 को सीवान जिले के हुसैनगंज प्रखंड के प्रतापपुर गांव में हुआ था। उसने अपनी पढ़ाई बिहार से ही पूरी की। राजनीति में एमए(MA) और पीएचडी(PHD) की। 1980 में डीएवी कॉलेज से राजनीति में पहला कदम रखा। सीवान के चार बार सांसद और दो बार विधायक रहे शहाबुद्दीन, कॉलेज के दौरान हीं अपराध की दुनिया में अपनी एंट्री कर दी थी। शहाबुद्दीन ने हिना शहाब से शादी की थी। उसका एक बेटा और दो बेटीयाँ हैं। 

आपराधिक मामले में अस्सी के दशक में शहाबुद्दीन का नाम पहली बार सामने आया था. 1986 में सिर्फ 19 साल की उम्र में उसके खिलाफ पहला आपराधिक मुकदमा हुसैनगंज थाना में दर्ज हुआ था। इसके बाद उसके नाम पर एक के बाद एक कई आपराधिक मुकदमे दर्ज होते गए। छोटी सी उम्र में ही अपराध की दुनिया में शहाबुद्दीन जाना माना नाम बन गया था। उसकी ताकत दिन-प्रति-दिन बढ़ती जा रही थी। जो भूमि भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के नाम से जानी जाती है वहाँ एक दरिंदगी की सारी हदें पार करने वाला अपनी पहचान बना रहा था। शहाबुद्दीन, कम्युनिस्ट और बीजेपी कार्यकर्ताओं के साथ मार-पीट के चलते चर्चित हुआ था। खूनी मारपीट से वो इतना चर्चा में रहा कि उसका नाम हीं शाबू-AK 47 पड़ गया था। शहाबुद्दान के बढ़ते हौंसले को देखकर पुलिस ने सीवान के हुसैनगंज थाने में शहाबुद्दीन की हिस्ट्रीशीट खोल दी और ए श्रेणी का हिस्ट्रीशीटर घोषित कर दिया। मतलब वैसा अपराधी जिसका सुधार कभी नहीं हो सकता।

राजनीतिक गलियारों में शहाबुद्दीन का नाम उस वक्त सुर्खियों में आया जब शहाबुद्दीन ने लालू प्रसाद यादव की छत्रछाया में जनता दल की युवा इकाई में कदम रखा। पार्टी में आते ही शहाबुद्दीन को अपनी ताकत और दबंगई का फायदा मिला। पार्टी ने शहाबुद्दीन को 1990 में विधानसभा का टिकट दिया। और सिर्फ 23 की उम्र में 1990 में शहाबुद्दीन जीत कर विधायक बन गया। जबकि विधायक बनने के लिए 25 न्यूनतम उम्र होती है। उसके बाद फिर से 1995 में चुनाव जीता। इस दौरान उसका कद और बढ़ गया। एक तरफ जहाँ राजनीति में वो आगे बढ़ते जा रहा था वहीं दूसरी तरफ सीवान समेत पूरे बिहार में उसका डर भी। पार्टी ने 1996 में लोकसभा का टिकट दिया और शहाबुद्दीन की जीत हुई। 1996 में हीं वो केन्द्रीय राज्य मंत्री बनते-बनते रह गया। क्योंकि एक केस खुल गया था।  1997 में राष्ट्रीय जनता दल के गठन और लालू प्रसाद यादव की सरकार बन जाने से शहाबुद्दीन की ताकत बहुत बढ़ गई थी। लालू यादव को पता था उनके लिए वोट शहाबुद्दीन लाएगा इस लिए वो इसका साथ और हाथ थामे रहे, पर इस वजह से बिहार में अपराध और खौफ का माहौल अपने चरम तक पहुँच गया। 

शहाबुद्दीन के अपराधों की लिस्ट बहुत लम्बी है जिनका कोई हिसाब नहीं है। 
सीवान में बाकायदा उसे कोई उसके नाम से नही बुलाता था। सब उसे साहब बुलाते थे। वहाँ पर साहब का मतलब हीं शहाबुद्दीन था। उसके एक भी फैसले पर किसी की हिम्मत नही थी कि उंगली उठा दे, और कोई ऐसा नही था जो उसके एक भी ऑर्डर को टाल सके। पुलिस, नेता वकील डॉक्टर जनता सब पर बस उसकी चलती थी। वो रंगदारी लेता था। वहाँ के डॉक्टर कितना फीस लेगा वो भी यही तय करता था,  क्योंकि साहब का ऑर्डर होता था। रात को 8 बजने से पहले लोग घर में घुस जाते थे। क्योंकि शहाबुद्दीन का डर था। लोग कोई नई कार नहीं खरीदते थे, अपनी तनख्वाह किसी को नहीं बताते थे क्योंकि रंगदारी देनी पड़ेगी। 
2000 के दशक तक सीवान जिले में शहाबुद्दीन का एक समानांतर सरकार चलाता रहा। उसकी एक अपनी अदालत थी। अपने घर मे, कभी जेल में वो अपनी अदालत लगता था।  जहां लोगों के फैसले हुआ करते थे। वो खुद सीवान की जनता के विवादों का निपटारा करता था। जमीन, पारिवारिक विवाद, भूमि विवाद, नौकरी, पढ़ाई उसके पास सब कुछ के फैसले लेने और उसे सुलझाने का अधिकार था।

एक तरफ जहाँ इसे डॉन कहा जाता वहीं दूसरी तरफ इसे लोगों का रॉबिनहुड भी कहा जाता था। एक फोन पर लोगों की समस्या हल कर देता था। लोगों की समस्याएं मिनटों में निपट जाती थीं। किसी का घर किसी ने हड़प लिया तो साहब का इशारा आता था और अगली सुबह वो आदमी खुद ही घर खाली कर चला जाता था। कई बार तो ऐसा हुआ कि पुलिस खुद सलाह देती की साहब के पास चले जाओ। पुलिस भी अपने काम के लिए उससे मिलने जाया करती थी।

एक दिन एक पुलिस वाला साहब के पास पहुंचा। तब  शहाबुद्दीन जेल में था उसकी हमेशा सोमवार और बुधवार को अदालत लगती थी। पुलिस वाला अपने प्रमोशन के लिए आया था। पुलिस वाले ने जेल में उसे बंदूक देते हुए कहा ये आपके लिए तोहफा, आप मेरा प्रोमोशन करवा दीजिये। शहाबुद्दीन बाकायदा फोन लेकर बैठता था, वो फोन करता और काम हो जाता। उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ शहाबुद्दीन ने पटना के एक पुलिस अफसर को फोन मिलाया और प्रमोशन हो गया।

ताकत के नशे में चूर मोहम्मद शहाबुद्दीन इतना अभिमानी हो गया था कि वह पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को कुछ नहीं समझता था। आए दिन अधिकारियों से उसकी मारपीट और झड़प होते रहती थी। यहां तक कि वो पुलिस वालों पर गोली चला देता था। मार्च 2001 में जब पुलिस राजद के स्थानीय अध्यक्ष मनोज कुमार पप्पू के खिलाफ एक वारंट में तामील करने पहुंची थी तो शहाबुद्दीन ने गिरफ्तारी करने आए अधिकारी संजीव कुमार को थप्पड़ मार दिया था और उनके आदमियों ने पुलिस वालों की पिटाई कर दी थी।

इस के बाद पुलिस बौखला गई। पुलिस ने मनोज और शहाबुद्दीन की गिरफ्तारी करने के मकसद से शहाबुद्दीन के घर छापेमारी करने पहुँची। और फिर पुलिस और शहाबुद्दीन समर्थकों के बीच गोलीबारी शुरू हो गई। इसके लिए बिहार पुलिस की टुकड़ियों के अलावा उत्तर प्रदेश पुलिस की मदद भी ली गई थी। छापे की उस कार्रवाई के दौरान दो पुलिसकर्मियों समेत 8 ग्रामीण लोग मारे गए। शहाबुद्दीन पुलिस के वाहनों को फुंक डाला। मौके से पुलिस को तीन AK-47 बरामद हुए। शहाबुद्दीन और उसके साथी मौके से भाग निकले थे।  इस घटना के बाद शहाबुद्दीन पर कई मुकदमे दर्ज किए गए थे। उसके भागने के लिए उसके आदमियों ने पुलिस पर हजारों राउंड फायर कर घेराबंदी कर दी थी।

सीवान में दो ही राजनीतिक पार्टियों की चलती थी । तब एक शहाबुद्दीन व दूसरा भाकपा माले। 1993 से 2001 के बीच सीवान में भाकपा माले के 18 समर्थक व कार्यकर्ताओं को शहाबुद्दीन ने मारवा डाला। जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष चंद्रशेखर व वरिष्ठ नेता श्यामनारायण भी इसमें शामिल थे। इनकी हत्या सीवान शहर में हीं 31 मार्च 1997 को की गई थी।  इस मामले की जांच सीबीआई ने की थी।

शहाबुद्दीन अपने इस खेल में इतना माहिर हो गया था कि अपना एक-एक कदम सोच के रखता था। 
सीवान में उसके जिले में रोड़ की व्यस्था अच्छी थी। पर सीवान से 20km पहले तक के सड़क गड्डों से भरे होते थे। जानकार कहते हैं जब भी सरकार उसे बनवाती, शहाबुद्दीन उसे तोड़वा देता था ताकि अगर पुलिस आई तो उसे कुछ समय मिल जाए।

शहाबुद्दीन का आतंक किस हद तक इसका पता दो घटनाओं से पता चलता है -

पहला- 1999 में शहाबुद्दीन ने कम्युनिस्ट पार्टी के एक कार्यकर्ता को किडनैप कर लिया था। उसके बाद उस कार्यकर्ता का आज तक कुछ पता ही नहीं चला। इसी मामले में 2003 में शहाबुद्दीन को जेल जाना पड़ा। 2004 के लोकसभा सभा चुनाव के आठ महीने पहले उसकी गिरफ्तारी हुई और उसे जेल जाना पड़ा। लेकिन चुनाव आते ही शहाबुद्दीन ने मेडीकल के आधार पर अस्पताल में शिफ्ट होने का इंतजाम कर लिया। अस्पताल का एक पूरा फ्लोर उसके लिए रखा गया था। जहां वो लोगों से मिलता और चुनावीं तैयारियाँ की समीक्षा करता। वहीं से फोन पर वह अधिकारियों, नेताओं को कहकर लोगों के काम कराता। अस्पताल के उस फ्लोर पर उसकी सुरक्षा के भाड़ी इंतजाम थे।
शहाबुद्दीन को चुनाव प्रचार करने की जरूरत नहीं पड़ी ये ऐसे हीं जीत गया। ओमप्रकाश यादव शहाबुद्दीन के खिलाफ खड़े हुए थे उन्हें वोट भी मिले थे पर चुनाव ख़त्म होने के बाद इनके आठ कार्यकर्ताओं का खून कर दिया गया था।

दूसरी घटना- जो सबसे ज्यादा चर्चित है, जिसे सोच कर हीं दिल दहल जाता है-
दो भाइयों को acid से नहला कर और एक भाई की गोली मार कर हत्या करा दी थी शहाबुद्दीन ने।

16 अगस्त 2004 में कथित तौर पर रंगदारी देने से इनकार करने के लिए सीवान निवासी व्यवसायी चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू के दो पुत्रों गिरीश (24 वर्ष) और सतीश (18 वर्ष) का अपहरण करके तेजाब से नहलाकर उनकी हत्या कर दी गई थी। 
मामला क्या था- शहाबुद्दीन के आदमी रंगदारी लेने आए थे। रंगदारी में 2 लाख रूपए मांगे गए , उतने इनके पास नही थे। जितने हो सके 30-40 हजार इन्होंने दे दिए । पर शहाबुद्दीन के आदमी ने इनके दुकान में तोर फोर करने लगे। जिससे गुस्सा होकर इसमें से एक भाई घर गया, acid की छोटी बोतल ले आया और उनपर डाल दिया जिससे इसके भाई पर भी छीटें पड़े थे। उसी के जवाब में और रंगदारी देने से इनकार करने पर 2004 के 16 अगस्त को राजीव रौशन के दो भाइयों गिरीश कुमार व सतीश कुमार का अपहरण कर हत्या कर दी गई थी। ऐसा बताया जाता है कि तेजाब से नहलाने के बाद बस हड्डियां बची थी उसे तक शहाबुद्दीन ने नही छोड़ा और कटवा के फेंकवा दिया। आरोप है कि दोनों को प्रतापपुर ले जाकर तेजाब से नहलाकर हत्या की गई।

उनका तीसरा भाई राजीव रौशन, शहाबुद्दीन के लोगों द्वारा किए गए अपराध का एक लौता गवाह था। शहाबुद्दीन के आदमी उसे भी अपने साथ ले गए थे पर वो किसी तरह वहाँ से बचकर बनारस जा पहुचा जब ये घटना हुई तो इनके पिता चंदा बाबू अपने एक दिव्यांग बेटे एक बेटी और पत्नी के साथ पटना में थे। उन्हें ये तक हिदायत दी गई थी कि सीवान न जाएं वरना उनका भी शहाबुद्दीन कत्ल कर देगा। पिता ने कई जगह न्याय के लिये दौड़ पर हर जगह शहाबुद्दीन का नाम सुनते हीं सब अपने हाथ पीछे कर लेते थे। तीसरा बेटा राजीव रौशन इस कांड का एक लौट चश्मदीद गवाह था। उसकी भी 6 जून 2014 को अदालत में शहाबुद्दीन खिलाफ गवाही देने जाने के समय रास्ते में डीएवी मोड़ पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
इस मामले में पटना हाई कोर्ट ने 9 दिसंबर 2015 को सीवान की विशेष अदालत के दिए फैसले को जारी रखा। इसमें शहाबुद्दीन समेत चार लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।  पटना हाई कोर्ट के 30 अगस्त, 2017 को दिए फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने भी मुहर लगा दी थी। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस केएम जोसेफ की पीठ ने 2004 में हुए दोहरे कत्ल के मामले में ये सजा दी थी।

साल 2004 के चुनाव के बाद से शहाबुद्दीन का बुरा वक्त शुरू हो गया था। इस दौरान शहाबुद्दीन के खिलाफ कई मामले दर्ज किए गए। राजनीतिक रंजिश भी बढ़ रही थी। 2005 में सीवान के प्रतापपुर में एक पुलिस छापे के दौरान शहाबुद्दीन के पैतृक घर से कई अवैध आधुनिक हथियार, सेना के नाइट विजन डिवाइस और पाकिस्तानी शस्त्र फैक्ट्रियों में बने हथियार बरामद हुए थे। वहाँ से इनके ISI से जुड़े होने की भी पुख्ता सबूत मिले थे। हत्या, अपहरण, बमबारी, अवैध हथियार रखने और जबरन वसूली करने के दर्जनों मामले शहाबुद्दीन पर हैं। अदालत ने शहाबुद्दीन को उम्रकैद की सुनाई थी।  नवंबर 2005 में बिहार पुलिस की एक विशेष टीम ने दिल्ली में शहाबुद्दीन को उस वक्त दोबारा गिरफ्तार कर लिया था जब वह संसद सत्र में भागेदारी करने के लिए यहां आया हुआ था।

फिर अदालत ने 2009 में शहाबुद्दीन के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी। उस वक्त लोकसभा चुनाव में शहाबुद्दीन ने अपनी पत्नी हिना शहाब को पर्चा भरवाया था। लेकिन वो चुनाव हार गई। 

एक और मामला है जो हमेशा चर्चे में रहा -एक पत्रकार की हत्या।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, सीबीआई चार्जशीट में बताया गया है कि दिसंबर 2014 में एक स्थानीय अख़बार में छपी सीवान जेल से जारी हिटलिस्ट पर हत्याएं ख़बर के कारण पूर्व सांसद शहाबुद्दीन ने पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या की साज़िश रची थी।
रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2016 में सीवान जेल में बिहार सरकार के तत्कालीन मंत्री अब्दुल गफूर और रघुनाथपुर के विधायक हरिशंकर यादव ने शहाबुद्दीन के साथ मीटिंग की थी। इस मीटिंग का वीडियो पहले पत्रकार राजदेव रंजन ने सोशल साइट पर वायरल किया था। फिर सभी अख़बारों में ख़बरें छपी थीं।
सीबीआई ने इस मामले में पिछले साल 21 अगस्त को आरोप पत्र दाखिल किया था।
शहाबुद्दीन पर एक अग्रणी हिंदी दैनिक के पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या में शामिल में होने का आरोप है। 13 मई 2016 की शाम बिहार के सीवान जिले में पत्रकार राजदेव रंजन की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उनकी पत्नी ने घटना में शहाबुद्दीन के शामिल होने का आरोप लगाया था।
बिहार सरकार ने इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपी थी।

शहाबुद्दीन 45 से अधिक आपराधिक मामलों में मुक़दमे का सामना कर रहे हैं। उन्हें सीवान निवासी चंद्रशेखर प्रसाद की अपील पर आए उच्चतम न्यायालय के आदेश पर तिहाड़ जेल लाया गया था। 

साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई करते हुए बिहार सरकार को निर्देश दिया था कि वह शहाबुद्दीन को एक हफ्ते के अंदर नई दिल्ली स्थित तिहाड़ जेल स्थानांतरित करे। उच्चतम न्यायालय के 15 फरवरी 2018 के एक आदेश के बाद राष्ट्रीय जनता दल के पूर्व नेता शहाबुद्दीन को तिहाड़ जेल में स्थानांतरित किया गया था।

इस मामले में सीवान के चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू और आशा रंजन ने राजद नेता शहाबुद्दीन को सीवान जेल से शिफ्ट किए जाने की याचिकाएं दायर की थीं। प्रसाद के तीन बेटे दो अलग-अलग घटनाओं में मारे गए थे और आशा के पति पत्रकार राजदेव रंजन की सीवान में हत्या हो गई थी।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत से अनुरोध किया था कि शहाबुद्दीन के खिलाफ लंबित मामलों की स्वतंत्र और निष्पक्ष सुनवाई के लिए उन्हें सीवान जेल से राज्य के बाहर किसी दूसरी जेल में शिफ्ट कर दिया जाए।

1 मई 2021 शनिवार को शहाबुद्दीन की दिल्ली के  दीन दयाल उपाध्याय (डीडीयू) अस्पताल में मृत्यु हो गई।  वो तिहार जेल के उच्च सुरक्षा जेल नंबर दो में बंद था। 20 अप्रैल को उसे हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। दिल्ली उच्च न्यायालय ने आप सरकार और जेल अधिकारियों को शहाबुद्दीन की उचित चिकित्सा देखभाल और निगरानी के निर्देश दिए थे। 1 मई को शहाबुद्दीन की कोविड-19 से संक्रमित होने के कारण मौत हो गई।

शहाबुद्दीन के जानकार रविशंकर पांडेय बताते हैं कि वो बचपन में क्रिकेट खेलने का शौकीन था और बेहद शांत और शालीन भी था। उन्हें आज भी यकीन नही होता कि बचपन का शहाबुद्दीन बड़े होकर बाहुबली विलेन कैसी बन गया।