शेख सलीम और शहज़ादे सलीम के जिंदगी की डोर

शेख सलीम और शहज़ादे सलीम के जिंदगी की डोर
सलीम का एक चित्र

जलाल उद्दीन मोहम्मद अकबर,मुग़ल वंश के तीसरे शाशक थे।'अकबर' भारत के इतिहास में सबसे अमीर और ताकतवर राजाओं के नाम मे से एक है।वो दौर था जब मुग़ल साम्राज्य अपने चरम पे था धन,धान्य और संपत्ति की कोई कमी नहीं थी कसक थी तो बस अपने उत्तराधिकारी की।अकबर की उम्र 28 हो चली थी और उनको केवल एक पुत्र की दरकार थी,और वो अपनी दरकार को पूरा करने के उपलक्ष्य कुछ भी करने को तैयार थे।एक पुत्र की आशा में वे सदा ही दान-धर्म किआ करते थे।उन्होंने यह प्रण भी लिया के जब उनको एक पुत्र की प्राप्ति होगी तो वे पैदल आगरा से अजमेर दरगाह पे नमाज़ पढ़ने आएंगे।

शेख सलीम चिश्ती ध्यान करते हुए।

कुछ वक्त बात उन्हें अपने मंत्रियों से शेख सलीम चिश्ती की शक्तियों के बारे में ज्ञात हुआ,अकबर उनसे मिलने लगातार जाने लगे।एक दिन शेख को खुश देखकर अकबर ने अपने भावनाओ पे वश खोते हुए शेख से पूछा "मुझे कितने पुत्र प्राप्त होंगे?" जिसका उत्तर शेख ने अपनी तीन उंगलियां दिखाते हुए कहा "तुम्हे 3 पुत्र प्राप्त होंगे"।

जब रानी मरियम-उल-ज़मानी(जोधा बाई) गर्भवती हुईं तो अकबर ने उन्हें अपने साथ शेक के महल को ले जाना सही समझा ताकि वे अपने बच्चे को दुनिया की बुरी ताकतों से बचा कर रख सकें।एक दिन जब बच्चे ने पेट मे लात मारनी बंद कर दी तो महल में कोहराम पसर गया।अकबर को सलाह मिली कि कुछ पाने के वास्ते कुछ खोना भी होता है,इस बात का सतज्ञान लेते हुए उन्होंने शुक्रवार को चीता का शिकार ना करने का प्रण लिया।

सलीम के जन्म के वक्त की एक चित्र।

बुधवार की एक सुबह 1569 को शहज़ादे का जन्म हुआ जिसे नाम मिला सलीम, यह नाम उसे शेख के नाम पे दिया गया।जिसके बाद पूरे राज्य में उत्सव का माहौल था,शहर इस कदर रौशन था मानो रात में भी सूर्यास्त नही हुआ।सोने ,चांदी,हीरे,जेवरहात जनता के बीच बाटें जा रहे थे।जेल से कैदियों को रिहा कर दिया गया था।मगर पिता अकबर अपने पुत्र से नही मिल सकते थे,एक मान्यता के अनुसार पिता अपने पुत्र से कुछ हफ्तों के लिए नही मिल सकते थे।इन सब के बीच अकबर की माँ हमीदा बानू बेगम अपने पोते के लिए 190 सुद्धता का माणिक लेकर उससे मिलने गयी।

कुछ साल बाद जब अकबर को तीन पुत्रों की प्राप्ति हो गयी तो एक दिन उन्होंने यूँही शेख से उनकी धरती पर शेष आयु के बारे में पूछा।जिसको पहले तो शेख ने टाला फिर अकबर के ज़ोर देने पे कहा"जब शहज़ादा सलीम किसी के कहने से या खुद से कुछ याद कर उसे बोल कर दोहराता है उसी दिन मेरी मृतु की तैयारी शुरू कर देना।"।

एक दिन शहज़ादे सलीम को कमरे में अकेला पा कर एक दासी उनके साथ खेलने लगी और गीत गुनगुनाए लगी जिसके बोल सलीम को याद हो गए।उस दिन जब सलीम अपने गुरु के पास गए तो उन्होंने वो गीत उन्हें सुनाया जिसके बाद गुरु सीधा अकबर की ओर भागे।जैसे ही अकबर शेख के पास पहुचे उन्होंने शेख की तबियत को नासाज़ पाया जिसके बाद शेख ने उनसे कहा "अलविदा"।