The 9PM Show: कोरोना की इस आपदा को मजबूत हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर के अवसर में बदलें।

कोरोना की इस आपदा को मजबूत हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर के अवसर में बदलें

कोरोना की दूसरी वेव में ऑक्सीजन की कमी, I.C.U. बेड्स की मारामारी, दवाइयों की कमी, कालाबाजारी व अन्य जीवनरक्षक संसाधनों की कमी ने हमें झकझोर कर रख दिया है। इन संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित कराने वाले एक मजबूत राष्ट्रीय ढांचे के न होने से हजारों लोगों की जानें गई हैं।

अपनी आर्थिक समृद्धि के प्रतीक रहे देश के बड़े-बड़े शहरों में एक अदद ऑक्सीजन सिलेंडर का इंतजाम सबसे बड़ी चुनौती बन गया था। इन सबने हमें एक बड़ा सबक यह सिखाया है कि किसी भी देश के लिए ठोस स्वास्थ्य सुविधाएं सबसे बड़ी ज़रूरत हैं। मजबूत हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर ही भविष्य में जान और जहान बचाएगा।

अब कोरोना की तीसरी वेव और बच्चों में भी संक्रमण की बात चल रही है। तीसरी लहर का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इसमें बच्चे बड़ी संख्या में प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे हालात में हमें दूसरी लहर और इस आपदा के हर सबक को पूरी पारदर्शिता और हिम्मत के साथ स्वीकार करके इसे भविष्य के लिए एक बहुत मजबूत हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर के अवसर में बदलना चाहिए। देश में अभी बेड की उपलब्धता प्रति दस हजार लोगों पर पांच है, देश के तकरीबन आधे राज्यों में यह स्थिति और कमजोर है। दूसरी ओर, हमारी आबादी में 12 साल से कम उम्र के बच्चों की संख्या करीब 16 करोड़ है।

विशेषज्ञों का आकलन है कि आज देश करीब 90 हजार I.C.U. बेड की उपलब्धता के साथ चुनौतीपूर्ण स्थिति का सामना कर रहा है। देश भर में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को एक्टिव करना होगा। ये इसलिए भी जरूरी है क्योंकि प्रत्येक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में औसतन 6 बेड हैं। पूरे देश में हमारे पास 30 हजार ऐसे केंद्र हैं यानी इन्हें सक्रिय करके हम 1.80 लाख ऑक्सीजन बेड तैयार कर सकते हैं। मेडिकल स्टाफ की कमी से जूझते स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों में भर्ती प्रक्रिया को तेज करना होगा।

कुछ राज्यों ने इस दिशा में बेहद प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने बीते कुछ माह से अपने तमाम निर्माण कार्य व गैर जरूरी खर्च रोक दिए हैं। वे इस रकम का प्रयोग स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाने पर कर रहे हैं। इस समय केंद्र और हर राज्य सरकार को यही नीति अपनानी चाहिए कि इस साल जो गैर-जरूरी खर्च हैं, इंफ्रास्ट्रक्चर के जो प्रोजेक्ट जरूरी नहीं हैं, उन्हें टाला जाए। इस वर्ष बजट का सर्वाधिक हिस्सा हर जिले में स्वास्थ्य सुविधाओं का एक मजबूत ढांचा तैयार करने में लगाया जाए। इससे न सिर्फ जीवनरक्षक उपकरण, I.C.U. बेड, ऑक्सीजन और मेडिकल-पैरामेडिकल स्टाफ की उपलब्धता सुनिश्चित हो सकेगी, बल्कि हर राज्य में कुछ जिलों पर बढ़ने वाला इलाज का दबाव भी कम होगा। इससे एक मजबूत विकेन्द्रित व्यवस्था स्थायी रूप में तैयार होगी।

अब वक्त स्वास्थ्य क्रांति का है। हेल्थ का जो अस्थायी इंफ्रास्ट्रक्चर इस समय देश में खड़ा है, हमें उसे स्थायी बनाना चाहिए। आपदाओं के साथ एक अच्छी बात होती है, वे सुधार की प्रक्रिया को कई गुना तेज कर देती हैं। जब देश के पास अनाज नहीं था, हमने हरित क्रांति कर दिखाई। जब देश के नौनिहालों के पास दूध नहीं था, हमने श्वेत क्रांति की। 90 के दशक में जब देश आर्थिक विपन्नता की ओर बढ़ रहा था, हमने आर्थिक सुधार लागू कर दिखाए। अब वक्त स्वास्थ्य क्रांति का है।

तो आइए पक्ष-विपक्ष से ऊपर उठकर, राजनीतिक दलों की सीमाओं को तोड़कर, आलोचनाओं की परवाह किए बगैर हम भारतीय अपने भाग्य विधाता यानी भारत से कहें- आयुष्मान भव: और आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ ऐसी व्यवस्था खड़ी कर दें, जिससे देश दोबारा कभी भी ऐसी कमी से न गुजरे।