दीदी ने खेल तो कर दिया

पश्चिम बंगाल में भारी जीत हासिल कर ममता बनर्जी ने कांग्रेस के साथ भी खेल कर दिया। तृणमूल कांग्रेस एक क्षेत्रीय दल है, उसने भारी-भरकम भारतीय जनता पार्टी से अकेले दम लोहा लिया और जीत दर्ज की। हालाँकि इतनी ही उल्लेखनीय जीत भारतीय जनता पार्टी की भी है, जिसने पश्चिम बंगाल में नंबर दो की हैसियत पाई। जहाँ बंगाल में भाजपा एक या दो सीटों पर जीत हासिल किया करती थी, वहाँ वह आज इस ऊँचाई पर पहुँच गई है। निश्चय ही यह प्रधानमंत्री की शैली का कमाल है। उन्होंने बता दिया है कि वे अभी भी वोट खींचने में सक्षम हैं। असम में भाजपा ने सरकार बना लेने का आँकड़ा पार कर लिया है और सारे कार्ड खेल कर तथा जिन बदरूद्दीन अज़मल के नज़दीक तरुण गोगोई कभी पार्टी को जाने नहीं देते थे, उनसे हाथ मिला कर भी कांग्रेस हाथ मलती रह गई। उसे पूरी उम्मीद केरल से थी, क्योंकि केरल में नियमतः उसे आना था, किंतु वामपंथी पिनराई विजयन बाजी मार ले गए। केरल में पिछले चार दशक से एक बार कांग्रेस की अगुआई वाली यूडीएफ और दूसरी बार वाम के नेतृत्त्व वाली एलडीएफ सत्ता में आती थी। पर इस बार एलडीएफ के पिनराई विजयन ने यह खेल पलट दिया। वे दोबारा सत्ता में आ गए। इसका सारा श्रेय उनकी सरकार की स्वास्थ्य मंत्री शैलजा टीचर को जाता है, जिन्होंने पूरे देश में सबसे बेहतर तरीक़े से कोविड पीड़ित लोगों को राहत पहुँचाई। पुद्दुचेरी में कांग्रेस ने सरकार गँवाई आई और तमिलनाडु में जिस डीएमके को भारी जीत मिली है, उसके साथ उसका समझौता तो है लेकिन हाथी और चींटी जैसा ही। एक तरह से कांग्रेस को हर जगह पराजय मिली और वह लगातार सिकुड़ती जा रही है।

यह कांग्रेस के चेहरे के लिए भारी धक्का है।एक तरह से जनता ने कांग्रेस के परिवार को पूरी तरह नकार दिया है। लेकिन कांग्रेस समझ नहीं पा रही। इन पाँच राज्यों के चुनाव के पूर्व कांग्रेस के कई संजीदा नेताओं ने पार्टी से पूर्णक़ालीन अध्यक्ष की माँग की थी। पर पार्टी ने उन नेताओं को ही अलग-थलग कर दिया। जी-23 के नाम से मशहूर इस गुट में कई ऐसे चेहरे हैं, जो रणनीति बनाने में माहिर तो हैं ही हर संकट के वक्त कांग्रेस पार्टी को उबारते रहे हैं। ग़ुलाम नबी आज़ाद, आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल से लेकर मनीष तिवारी तक किंतु कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्त्व ने उनकी एक न सुनी। कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी अपने पुत्र या पुत्री को ही पार्टी की विरासत सौंपना चाहती हैं। मगर उनकी संतानों में न तो विजन है न भारत की जनता को समझने का माद्दा। ऐसी स्थिति में भला वे कैसे नरेंद्र मोदी का मुक़ाबला कर सकते हैं।

नरेंद्र मोदी को कोविड कंट्रोल न कर पाने के लिए चाहे जितना कोसा जाए या उन्हें ख़ूब नाकारा बताया जाए पर सत्य यह भी है कि आज भी वे देश के सबसे लोकप्रिय राजनेता हैं। क्योंकि कांग्रेस के पास अपनी कोई सक्षम रणनीति नहीं है न कोई ज़मीनी नेता उसके पास है। अब बंगाल ने यह ज़रूर बता दिया है कि नरेंद्र मोदी के सात वर्ष के शासन में पहली बार एक ऐसा नेता मिला है, जिसने नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी को अपना क़िला फ़तह नहीं करने दिया। भाजपा का फ़ोकस सिर्फ़ बंगाल के दुर्ग को जीतना था। भाजपा नेता बंगाल को जीतने के लिए इतने व्यग्र थे कि वे ऐन-केन-प्रकारेण वहाँ कमल खिलाना चाहते थे, भले उसके लिए उन्हें असम गँवाना पड़ता। ख़ैर भाजपा ने असम नहीं गँवाया और बंगाल में सरकार चाहे न बना पाए हों मगर नम्बर दो पार्टी तो बन ही गए। उधर पुद्दुचेरी में भी भाजपा नीत एनडीए को जीत मिली है। अर्थात् बंगाल में सरकार न बनाने का सपना पूरा न होने के बावजूद भाजपा कोई घाटे में नहीं रही।

पर राजनीति बहुत विचित्र खेल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राहुल गांधी को भले बौना कर दिया हो किंतु ममता बनर्जी का क़द बढ़ा दिया है। ममता 2024 में विपक्ष की साझा पीएम उम्मीदवार बन सकती हैं। उनके पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसी भाषण-शैली है। अपनी इस शैली से वे सब को लुभाती भी हैं। हिंदी में भी उन्होंने अब पकड़ बना ली है। उन्हें ज़मीन की समझ है और महिलाओं तथा मुसलमानों को अपने साथ ले कर चलने में भी वे माहिर हैं। उनकी पार्टी क्षेत्रीय ज़रूर है, लेकिन उसका फलक बड़ा है। बंगाल में बसे कई उत्तर भारतीयों को उन्होंने टिकट दिया और वे जीते भी। उनके भतीजे अभिषेक पर भले भ्रष्टाचार के दाग हों, उनका आँचल पाक-साफ़ है। वे सादगी पसंद हैं और विपक्ष में सब को साधने की कला उन्हें आती है। बस उन्हें अपने ‘हुज्जते-बंगाल’ पर क़ाबू पाना होगा। इसलिए ममता का उभरना भाजपा के लिए जितना बड़ा ख़तरा है, उससे ज़्यादा राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस पर। फ़िलहाल तो ममता बनर्जी ने जीत का परचम लहर दिया है।