शिव की नगरी "उज्जैन"

About the history of ujjain

शिव की नगरी "उज्जैन"
Shiv ka damro shiv ki nagri me
शिव की नगरी "उज्जैन"

पुराणों व महाभारत में उल्लेख आता है कि वृष्णि-वीर कृष्ण व बलराम यहाँ गुरु सांदीपनी के आश्रम में विद्याप्राप्त करने हेतु आये थे। कृष्ण की एक पत्नी मित्रवृन्दा उज्जैन की ही राजकुमारी थी। उसके दो भाई विन्द एवं अनुविन्द महाभारत युद्ध में कौरवों की और से युद्ध करते हुए वीर गति को प्राप्त हुए थे। ईसा की छठी सदी में उज्जैन में एक अत्यंत प्रतापी राजा हुए जिनका नाम चंड प्रद्योत था। भारत के अन्य शासक उससे भय खाते थे। उसकी दुहिता वासवदत्ता एवं वत्सनरेश उदयन की प्रणय गाथा इतिहास प्रसिद्ध है प्रद्योत वंश के उपरांत उज्जैन मगध साम्राज्य का अंग बन गया।जैन ग्रंथों के अनुसार राजा खादिरसार का शासन मगध में था , उनकी राजधानी उज्जैन थी , उनके शासन का समय 386 ईसा पूर्व था , राजा खादीरसार के पिता का नाम कुणिका था , जो कि 414 ईसा पूर्व के दौरान मगध के राजा थे , राजा खादिरसार की पत्नी का नाम चेलमा था , प्रारंभ में राजा खादिरसार बौद्घ धर्म के अनुयाई थे , परन्तु रानी चेलामा के उपदेश से प्रभावित होकर उन्होंने जैन धर्म अपना लिया और महावीर स्वामी जी के प्रथम भक्त बन गए, उज्जैन में पहली शताब्दी के आरंभ में राजा गर्दभिल्ल का शासन था , वे एक वीर राजा थे , जिनके पराक्रम से शक शासक भी डरते थे । गर्दभिल्ल , भील जनजाति से संबंधित हैं , पूर्वी ओडिशा में गर्दभिल्ल शासक हुआ करते थे जो भील जनजाति के होते थे ।सम्राट विक्रमादित्य गर्दभिल्ल वंश के शासक थे , उनके पिता राजा गर्दभिल्ल थे , भारत में शकों को बुलाने का श्रेय कलकाचार्य नामक साधु को है , शकों ने उज्जैन के शासक गर्दभिल्ल को युद्ध में हराकर उज्जैन पर अधिकार जमा लिया , तब राजा गर्दभिल्ल के पुत्र विक्रमादित्य ने शकों के खिलाफ युद्ध किया , विक्रमादित्य ने शकों को परास्त कर उज्जैन में पुनः गर्दभिल्ल साम्राज्य स्थापित किया और वे इस देश के महान सम्राट कहलाए ।महाकवि कालिदास उज्जयिनी के इतिहास प्रसिद्ध सम्राट विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों में से एक थे। इनको उज्जयिनी अत्यंत प्रिय थी। इसीलिये कालिदास ने उज्जयिनी का अत्यंत ही सुंदर वर्णन किया है। सम्राट विक्रमादित्य ही महाकवि कालिदास के वास्तविक आश्रयदाता के रूप में प्रख्यात है।
महाकवि कालिदास की मालवा के प्रति गहरी आस्था थी। उज्जयिनी में ही उन्होंने अत्यधिक प्रवास-काल व्यतीत किया और यहीं पर कालिदास ने उज्जयिनी के प्राचीन एवं गौरवशाली वैभव को देखा। वैभवशाली अट्टालिकाओं, उदयन, वासवदत्ता की प्रणय गाथा, भगवान महाकाल संध्याकालीन आरती तथा नृत्य करती गौरीगनाओं के सात ही क्षिप्रा नदी का पौराणिक महत्व आदि से भली भांति परिचित होने का अवसर भी प्राप्त किया हुआ जान पड़ता है।
'मेघदूत' में महाकवि कालिदास ने उज्जयिनी का सुंदर वर्णन करते हुए कहा है कि जब स्वर्गीय जीवों को अपने पुण्यक्षीण होने की स्थिति में पृथ्वी पर आना पड़ा। तब उन्होंने विचार किया कि हम अपने साथ स्वर्ग का एक खंड (टुकत्रडा) भी ले चले। वही स्वर्गखंड उज्जयिनी है। आगे महाकवि ने लिखा है कि उज्जयिनी भारत का वह प्रदेश है जहां के वृध्दजनइतिहास प्रसिद्ध आधिपति राजा उदयन की प्रणय गाथा कहने में पूर्ण दक्ष है।
कालिदास के 'मेघदूत' में उज्जयिनी का वैभव आज भले ही विलुप्त हो गया हो परंतु आज भी विश्व में उज्जयिनी का धार्मिक-पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व के सात ही ज्योतिक्ष क्षेत्र का महत्व भी प्रसिद्ध है। उज्जयिनी भारत की सात पुराण प्रसिद्ध नगरियों में प्रमुख स्थान रखती है। उज्जयिनी में प्रति बारह वर्षों में सिंहस्थ महापर्व का आयोजन होता है। इस अवसर पर देश-विदेश से करोड़ों श्रध्दालु भक्तजन, साधु-संत, महात्मा महामंडलेश्वर एवं अखात्रडा प्रमुख उज्जयिनी में कल्पवास कर मोक्ष प्राप्ति की मंगल कामना करते हैं।
उज्जयिनी की ऐतिहासिकता का प्रमाण 600 वर्ष पूर्व मिलता है। तत्कालीन समय में भारत में जो सोलह जनपद थे उनमें अवंति जनपद भी एक था। अवंति उत्तर एवं दक्षिण इन दो भागों में विभक्त होकर उत्तरी भाग की राजधानी उज्जैन थी तथा दक्षिण भाग की राजधानी महिष्मति थी। उस समय चंद्रप्रद्योत नामक सम्राट सिंहासनारूढ थे। प्रद्योत के वंशजों का उज्जैन पर तीसरी शताब्दी तक प्रभुत्व था।मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य यहाँ आए थे। उनके पोते अशोक यहाँ के राज्यपाल रहे थे। उनकी एक भार्या वेदिसा देवी से उन्हें महेंद्र और संघमित्रा जैसी संतान प्राप्त हुई जिसने कालांतर में श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार किया था। मौर्य साम्राज्य के अभुदय होने पर मगध सम्राट बिन्दुसार के पुत्र अशोक उज्जयिनी के समय नियुक्त हुए। बिन्दुसार की मृत्योपरान्त अशोक ने उज्जयिनी के शासन की बागडोर अपने हाथों में सम्हाली और उज्जयिनी का सर्वांगीण विकास कियां सम्राट अशोकके पश्चात उज्जयिनी ने दीर्घ काल तक अनेक सम्राटों का उतार चढ़ाव देखा।मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद उज्जैन शकों और सातवाहनों की प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन गया। शकों के पहले आक्रमण को उज्जैन के वीर सम्राट विक्रमादित्य के नेतृत्व में यहाँ की जनता ने प्रथम सदी पूर्व विफल कर दिया था। कालांतर में विदेशी पश्चिमी शकों ने उज्जैन हस्त गत कर लिया। चस्टान व रुद्रदमन इस वंश के प्रतापी व लोक प्रिय महाक्षत्रप सिद्ध हुए।चौथी शताब्दी में गुप्तों और औलिकरों ने मालवा से इन शकों की सत्ता समाप्त कर दी। शकों और गुप्तों के काल में इस क्षेत्र का अद्वितीय आर्थिक एवं औद्योगिक विकास हुआ। छठी से दसवीं सदी तक उज्जैन गुर्जर प्रतिहारों की राजनैतिक व सैनिक स्पर्धा का दृश्य देखता रहा।
सातवीं शताब्दी में उज्जैन कन्नौज के हर्षवर्धन साम्राज्य में विलीन हो गया। उस काल में उज्जैन का सर्वांगीण विकास भी होता रहा। वर्ष ६४८ में हर्ष वर्धन की मृत्यु के पश्चात गुर्जर काल में नवी शताब्दी तक उज्जैन परमार राजवंश के आधिपत्य में आया जो ग्यारहवीं शताब्दी तक कायम रहा इस काल में उज्जैन की उन्नति होती रही। इसके पश्चात उज्जैन चौहान राजवंश और तोमर राजवंश के अधिकारों में आ गया।
वर्ष १००० से १३०० तक मालवा परमार-शक्ति द्वारा शासित रहा। काफी समय तक उनकी राजधानी उज्जैन रही। इस काल में सीयक द्वितीय, मुंजदेव, भोजदेव, उदयादित्य, नरवर्मन जैसे महान शासकों ने साहित्य, कला एवं संस्कृति की अभूतपूर्व सेवा की।
दिल्ली के दास एवं खिलजी सुल्तानों के आक्रमण के कारण परमार वंश का पतन हो गया। वर्ष १२३५ में दिल्ली का शमशुद्दीन इल्तमिश विदिशा विजय करके उज्जैन की और आया यहां उस क्रूर शासक ने उज्जैन को ना केवल बुरी तरह लूटा अपितु उनके प्राचीन मंदिरों एवं पवित्र धार्मिक स्थानों का वैभव भी नष्ट किया। वर्ष १४०६ में मालवा दिल्ली सल्तनत से मुक्त हो गया और उसकी राजधानी मांडू से धोरी,खिलजी व अफगान सुलतान स्वतंत्र राज्य करते रहे। मुग़ल सम्राट अकबर ने जब मालवा पर आक्रमण किया तो उज्जैन को प्रांतीय मुख्यालय बनाया गया। मुग़ल बादशाह अकबर,जहाँगीर,शाहजहाँ व औरंगजेब यहाँ आये थे।दिल्ली शहर का नाम पूर्व काल मे देहली था और दिल्ली पर मुस्लिम बादशाहो के पहले पूर्व मे तंवर वंश राजपूत राजा अंनगपाल के राज था तंवर वंशज के राजपूतो के पहले पूर्व मे भील राजा दल्ला डिडोंर के नाम पर दिल्ली का नामकरण हुआ,सन् १७३७ ई. में उज्जैन सिंधिया वंश के अधिकार में आया उनका वर्ष १८८० तक एक छत्र राज्य रहा जिसमें उज्जैन का सर्वांगीण विकास होता रहा। सिंधिया वंश की राजधानी उज्जैन बनी। राणोजी सिंधिया ने महाकालेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। इस वंश के संस्थापक राणोजी शिंदे के मंत्री रामचंद्र शेणवी ने वर्तमान महाकाल मंदिर का निर्माण करवाया। वर्ष १८१० में सिंधिया राजधानी ग्वालियर ले जाई गयी किन्तु उज्जैन का सांस्कृतिक विकास जारी रहा। १९४८ में ग्वालियर राज्य का नवीन मध्य भारत में विलय हो गया।
उज्जयिनी में आज भी अनेक धार्मिक पौराणिक एवं ऐतिहासिक स्थान हैं जिनमें भगवान महाकालेश्वर मंदिर, गोपाल मंदिर, चौबीस खंभा देवी, चौसठ योगिनियां, नगर कोट की रानी, हरसिध्दि मां, गढ़कालिका, काल भैरव, विक्रांत भैरव, मंगलनाथ, सिध्दवट, मजार-ए-नज़मी, बिना नींव की मस्जिद, गज लक्ष्मी मंदिर, बृहस्पति मंदिर, नवगृह मंदिर, भूखी माता, भर्तृहरि गुफा, पीरमछन्दर नाथ समाधि, कालिया देह महल, कोठी महल, घंटाघर, जन्तर मंतर , चिंतामन गणेश आदि प्रमुख हैं।